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Tuesday, June 9, 2009

लड़कियाँ फिर आगे: नकल यज्ञ फलीभूत हुआ

हाल ही में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा परिषद ने हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट के परीक्षा परिणाम घोषित किए। हर साल की तरह इस साल भी अखबारों ने वही शीर्षक लगाया। लड़कियों ने एक बार फिर बाजी मारी। मैं यह शीर्षक पिछले दो दशक से प्रायः हर साल पढ़ता आ रहा हूँ। इस खबर का आधार यह होता है कि परीक्षा में सम्मिलित होने वाली कुल लड़्कियों में से उत्तीर्ण होने वाली लड़कियों का प्रतिशत लड़कों के उत्तीर्ण प्रतिशत से अधिक होता है। लड़कियों द्वारा बेहतर प्रदर्शन का यह आँकड़ा हमारे ग्रामीण समाज की जिस विडम्बनापूर्ण तस्वीर को उजागर करता है उसकी पड़ताल तब की जा सकती है जब निम्न आँकड़े भी उपलब्ध हों-

 

  1. प्रदेश के चौदह वर्ष से अठारह वर्ष की आयुवर्ग (हाई स्कूल व इण्टर मीडिएट स्तर) के सभी लड़के-लड़कियों का लिंग अनुपात
  2. इसी आयु वर्ग से विद्यालय जाने वाले लड़के व लड़कियों का लिंग अनुपात
  3. बिन्दु-१ व २ के आँकड़ों में अन्तर का प्रतिशत ( शिक्षा के अवसर की सापेक्ष उपलब्धता)
  4. लड़कियों को अपने विद्यालय पर अपने गुरुजनों के सानिध्य में (स्वकेन्द्रीय) परीक्षा देने की सुविधा प्राप्त होने की प्रतिशतता

यदि कोई शोधार्थी इन आँकड़ों को उपलब्ध करा सकें तो ठोस निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। लेकिन अभी तो मैं व्यक्तिगत अनुभव और पर्यवेक्षण के आधार पर ग्रामीण विद्यालयों में लड़कियों की शिक्षा की उपादेयता पर आमजन के दृष्टिकोण को बता सकता हूँ। हाँ, मेरा उद्देश्य कहीं से भी लड़कियों की प्रतिभा को कम बताना नहीं है। न ही मैं सफलता के नये मापदण्ड स्थापित करने वाली लड़कियों का अनादर करना चाहता हूँ। मेरा फोकस केवल ग्रामीण समाज में फैली शिक्षा-निरोधी विषबेल की ओर है।

 

मोटे तौर पर लड़कियों की शिक्षा को गाँवों में उतनी तरजीह नहीं दी जाती जितनी लड़कों की शिक्षा को। लड़कियों के लिए नौकरी का उद्देश्य तो बिरले ही परिवारों में रखा जाता है। जो परिवार लड़कियों को पढ़ाते भी हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि शादी करने में अड़चन न आए। कैरियर का महत्व कम ही होता है। इण्टर पास कराके शादी ढूँढना शुरू कर देते हैं। इसलिए सबकी कोशिश लड़की को बेदाग पास करा लेने की होती है। सबका मुक्त सहयोग मिलता है उन्हें। कई परीक्षा केन्द्र तो लड़कियों को अलग कमरों में बिठाकर विशेष सुविधा देने का इन्तजाम भी करते है। कोई निरीक्षक लड़कियों की चेकिंग नहीं करना चाहता। सभी उसके प्रति उदार दृष्टिकोण रखते हैं।

 

पास हो जाएगी तो शादी करके घर बसा लेगी और क्या? लड़कों से नौकरी तो छीन नहीं लेगी।

 

साल भर घर में झाड़ू-पोंछा, चौका-बरतन और रसोई सम्हालने वाली लड़कियाँ और बहुएं भी इण्टर पास करने के लिए परीक्षाकेन्द्रों पर पहुँची मिल जाएंगी। बहुएं इसलिए कि अब हाई-स्कूल/इण्टर की मेरिट पर भी गाँव में शिक्षामित्र और आँगन वाणी कार्यकर्त्री की नौकरी मिलने लगी है।

 

पहले तो केवल सॉल्वर रखे जाते थे, अब कुछ केन्द्र राइटर की व्यवस्था भी करते हैं। मुलायम सिंह यादव की कन्या विद्या धन योजना ने तो इस दिशा में कमाल ही कर दिया। इस योजना में इंटर पास होते ही २०००० रुपए का चेक सुनिश्चित था। केवल गरीबी का सर्टिफिकेट लगाना होता था जो इस भ्रष्ट समाज में काफी सुलभ हो गया है।

 

इण्टर की परीक्षा पास करने के बाद यदि तत्काल शादी का जुगाड़ नहीं फिट बैठा तो आगे भी नाम लिखाकर प्राइवेट पढ़ाई करानी पड़ती है ताकि लड़के वालों को बताया जा सके कि लड़की बी.ए./एम.ए. में पढ़ रही है। शादी तय हो जाने के बाद यह लड़के के ऊपर निर्भर है कि वह आगे क्या कराएगा। ऐसी हालत में लड़कियों की शिक्षा का उद्देश्य कैरियर बनाने और काबिलियत बढ़ाने के बजाय सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य बहू बनने का हो जाता है। इस उद्देश्य के मद्देनजर निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियाँ शिक्षा के नाम पर केवल प्रमाणपत्र इकठ्ठा करके रह जाती हैं, जिसमें पूरा समाज ही सहयोग करने को आतुर रहता है।

 

इस वर्ष की परीक्षाओं में शिक्षा विभाग के अधिकारियों से लेकर अभिभावकों और छात्रों ने नकल के धन्धे का भरपुर लुत्फ़ उठाया। परीक्षा केन्द्र नीलाम हुए। प्रदेश के शिक्षा मन्त्री को खुलेआम स्वीकार करना पड़ा कि नकल हुई है। इसमें रोचक बात यह है कि प्रदेश के शिक्षाधिकारियों की बैठक में उन्होंने सबको फटकार लगाते हुए कहा कि नकल कराने वाले विद्यालयों को चिह्नित करके उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाएगी। यानि जहाँ का परीक्षा परिणाम अपेक्षा से अधिक अच्छा रहा है उनको नकलची मानकर दण्डित किया जाएगा।

 

मन्त्री जी ने उसी बैठक में राजकीय विद्यालयों के खराब प्रदर्शन को आड़े हाथों लेते हुए सम्बन्धित शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही की चेतावनी भी दे डाली। वे बेचारे सोच रहे हैं कि उन्हें भी शायद नकल यज्ञ में कुछ आहुति देनी चाहिए थी।

[मलय]

Saturday, May 16, 2009

भारत में काफ़्काइयत बदस्तूर जारी रहेगी: फ़्रांस्वाँ गातिए ध्यान दें !

चेक उपन्यास्कार फ़्रैन्ज़ काफ़्का (Franz kafka, 1852-1931) ने अपने उपन्यासों The Trial ,The Castle, व The Metamorphosis में एक ऐसे विवेक भ्रष्ट समाज की रचना की है जहाँ सब कुछ नित्तांत बेतुका, अतार्किक, हास्यास्पद, खतरनाक और घोर अंधेरगर्दी के घटाटोप से अच्छादित दिखाई देता है। उनके उपन्यासों से जिस प्रकार के बेढंगे समाज का चित्र उभरता है, वह इतना बदनाम हुआ है कि व्यावहारिक दुनिया मे जहां ऐसे समाज दॄष्टिगोचर होते हैं उन्हें काफ्काई समाज [Kafkaesque/Kafkaian] की संज्ञा दे दी जाती है। ऐसी प्रतिगामी प्रवृत्तियों को काफ़्काइयत कहा जा सकता है।

 

फ़्रांस्वाँ गातिए (Francois Gautier) लम्बे समय से भारत में रहते हुए अनेक यूरोपीय पत्र-पत्रिकाओं के लिए काम किया है। दक्षिण एशियाई समाज और राजनीति के फ्रांसीसी विशेषज्ञ व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्टित पत्रकार फ़्रांस्वा गातिए ने अपने एक लेख मे यहां के वर्तमान राजनैतिक परिदॄश्य में काफ़्काई समाज की झलक देखते हुए लिखा है कि यहाँ की राजनीति में कई बाते इतनी बेतुकी हैं और ऐसे नाजायज निष्ठुर, उत्तेजनापूर्ण और अतार्किक स्तर को छूने लगी हैं कि दिमाग परेशान हो उठता है। फिर भी न तो यहाँ के राजनेता और न ही यहाँ का प्रेस इसमें कुछ गलत देख पाता है। कुछ उदाहरण देखिए:-

 

(१.)भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता वरुण गान्धी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत लगभग तीन सप्ताह जेल में सिर्फ़ इसलिए बिताना पड़ा क्योंकि उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया था जो दोषपूर्ण था। जबकी बहुत से मुल्ला अपने जुम्मा की तक़रीर में आग और जहर उगलते रहते हैं, किन्तु कोई गिरफ़्तार नही किया जाता क्योंकि इससे तुरन्त दंगे भड़कने का अंदेशा होता है।

 

(२.)साध्वी प्रज्ञा नामक एक हिन्दू सन्यासी महीनों से जेल में यातना भुगत रही है जब कि अभी तक मालेगाँव धमाकों में उसकी संलिप्तता का एक भी विश्वसनीय सबूत जुटाया नहीं जा सका है। हाल ही मे उसके उपर मुम्बई जेल के भीतर एक मुसलमान कैदी ने हमला कर दिया जिसमे उनके मुँह, नाक और गले पर चोटे आयीं।

 

वहीं एक मुसलमान नेता अब्दुल नासिर मदनी है जो १९९८ के कोयम्बटूर दंगों के आरोपी थे। इसमें ६० निर्दोष लोगों की जान गई थी। न्याय प्रक्रिया की ढिलाई के चलते वे बरी हो गये और आजकल केरल में सी.पी.आई.(एम.) के साथ उनकी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव प्रचार कर रही है- है न यह काफ़्काइयत?

 

(३.) उड़ीसा के कंधमाल से भाजपा प्रत्याशी अशोक साहू को पुलिस ने इसलिए गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने चर्च के उपर भोले-भाले आदिवासियों को जबरन ईसाई बनाने के लिए विदेशी धन के प्रयोग का आरोप लगाया था। जबकि यह सभी जानते है कि यह आरोप पूरी तरह पुष्ट तथ्यों पर आधारित होने के कारण सिद्ध हो चुका है।

 

वहीं दूसरी ओर आतंकी अजमल क़साब, जो मुम्बई में हत्या के अभियान पर निकला था, आजकल सरकारी खर्चे पर शाही जिन्दगी जी रहा है। उसके विरुद्ध तैयार आरोप पत्र के ११००० पन्नों को उर्दू में अनूदित किया जा रहा है क्योंकि इन सज्जन ने ऐसी इच्छा व्यक्त की है। यह काफ़्काइयत है कि नहीं?

 

(४.) भारत के राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम घोषित हो जाने से पहले अफ़जल गुरू को फाँसी पर लटकाने की अनुमति नही दे सकतीं। वही आतंकी सरगना जो १३ दिसम्बर २००१ को संसद पर हमले के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। फाँसी इसलिए टाली जा रही है क्योंकि इससे मुस्लिम वोट छिटक जाने का डर है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस यह कहते नही थकती कि भारत के मुसलमान राष्ट्रभक्त है। लेकिन एक सिद्ध राष्ट्रद्रोही मुस्लमान को फाँसी देने पर सामान्य मुसलमानों का वोट खो देने का डर क्यों सताता है? आप फैसला कीजिए कि यह काफ़्काइयत है कि नही?

 

(५.) तमिल चीतों ने एक मूर्खतापूर्ण सोच के आधार पर राजीव गान्धी को अत्यन्त क्रूरता पूर्वक सिर्फ इसलिए उनके चीथड़े उड़ा दिये थे कि उनके दुबारा प्रधानमंत्री बन जाने का अंदेशा था। गान्धी परिवार के साथ-साथ यह देश के लिए भी एक त्रासदी थी। लेकिन आज, तमिलनाडु के वोटरों को रिझाने के लिए उन्हीं की विधवा सोनिया गान्धी ने श्रीलंका की सरकार के पास अपना विशेष दूत इस उद्देश्य से भेंजा ताकि वहाँ युद्धविराम लागू करने का दबाव बना सके; जबकि बीस साल से चल रहे खूनी संघर्ष के बाद वहाँ की सरकार अब खँखार तमिल चीतो का सफाया करने के द्वार पर खड़ी है। क्या यह बात कहीं से भी समझ में आने वाली है? क्या यह काफ़्काइयत नही है?

 

(६.) भारत में सबकी बराबरी और जाति से उपर उठने की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। सम्विधान में इसकी स्पष्ट घोषणा है। लेकिन १९४७ से अबतक देश के राजनेताओं ने, खासकर कांग्रेस और बाद में इससे निकाले गये वी.पी.सिंह, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव आदि ने देश को जाति और धर्म के आधार पर बाँटने का निराशाजनक कृत्य ही किया है। लेकिन अब मायावती ने उन सबको पीछे छोड़ दिया है उन्होंने प्रधानमंत्री बनने की अपने ख्वाहिश को पूरा करने के लिए १६ अन्य जातियों को भी अनुसूचित जाति मे शामिल करने का वादा कर दिया है। क्या वोट पाने के लिए इससे भी बड़ा क़ाफ़्काई तरीका आप सोच सकते है?

 

(७.) भारत मे चुनाव अभियान पर किसी को २५ लाख से अधिक खर्च करने की इज़ाजत नही है। लेकिन सबको यह पता है कि सांसद बनने के लिए दसियों करोड़ खर्च करने पड़ते है। आपको चुनावी अभियान को शानदार बनाने के लिए सैकड़ों कारों के काफिलों का प्रदर्शन करना है, निजी हवाई-जहाज और हेलीकाप्टर भाड़े पर लेना है, मुफ्त की साड़ियां-धोतियाँ, टेलीविजन और यहाँ तक की नगदी भी, और बहुत कुछ बाँटना है। आखिर इस सब के लिए यह कालाधन कहाँ से आता है? भ्रष्ट व्यापारियों से, माफिया से, दलाली से, और क्या? क्या इससे भी अधिक काफ़्काइयत की कल्पना की जा सकती है?

 

कुल मिलाकर भारत में लोकतंत्र पूरी तरह काफ़्काइयत का नमूना बनकर रह गया है क्योंकि यह इतना बिगड़ चुका है और गलत हाथों में अपहृत हो चुका है कि अब इसे पूरी तरह एब्सर्ड ही कहा जा सकता है।

 

इस बात में सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि भारतीय प्रेस और मीडिया भी अपनी भूमिका नहीं निभा रहा है। क्योंकि मुख्यधारा के किसी भी अखबार या न्यूज चैनल ने आपत्ती नहीं उठायी जब वरुण गान्धी जेल में थे या जब मदनी सजा से छूट गये थे। और एक पार्टी में पूरा सहयोग और सम्मान पाते रहे।

 

वस्तुतः मुख्य समस्या यह है कि भारत लम्बे समय तक विदेशियों का गुलाम रहा है। वहीं चीन में ऐसा नहीं है। वहाँ के लोग अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव रखते हैं तथा घोर राष्ट्रवादी हैं। इसके उलट भारतीय मानस में यहाँ की गुलामी के इतिहास ने क हीनता ग्रन्थि का निर्माण किया है। यहाँ के कथित बुद्धिजीवी अपनी ही हर बात विश्वसनीय मानने से पहले पश्व्चिमी स्वीकृति और समर्थन के लिए उधर का मुँह ताकते हैं। भारत में पाश्चात्य शैली का लोकतन्त्र अपनाने (नकल करने ) का ऐसा विचित्र व्यामोह है कि उन्हें इसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढालने की सुध ही नहीं रहती।

 

यहाँ का शासन तंत्र और समाज इतना दूषित हो चुका है कि अब बीमार हिस्से को एक बड़े ऑपरेशन द्वारा काट फेंकने का रास्ता बचा है। अब बड़े स्तर पर साफ-सफाई किया जाना अपरिहार्य हो गया है।

 

नोट: फ़्रांस्वाँ गातिए का यह लेख कुछ सप्ताह पहले आया था। आज इसे यहाँ प्रस्तुत करते समय नयी लोकसभा का स्वरूप सामने आ चुका है। जनता ने एक बार फिर उसी सरकार को चुना है जो पिछले पाँच साल तक इस काफ़्काइयत की पोषक रही थी। इस परिणाम ने बता दिया कि भारत के वोटर इस अन्धेरगर्दी में बने रहने को ही पसन्द करते हैं। शायद उनका मानना है कि इससे बेहतर विकल्प देश में मौजूद ही नहीं है।

फ़्राँन्ज़ काफ़्का अमर रहें!!!

मलय त्रिदेव

Tuesday, April 7, 2009

दलित विमर्श चालू आहे...।

लावण्या शाह मुम्बई फिल्म जगत के शीर्ष पुरुष पं. नरेन्द्र शर्मा जी की बेटी हैं। उन्होंने पिछले दिनों अपने ब्लॉग पर एक दलित जाति की विमान परिचारिका के बारे में प्रशंसात्मक पोस्ट लिखी थी। लेकिन किसी नीलोफ़र ने अपनी टिप्पणी में उन्हें यह याद दिला कर आहत कर दिया कि उनकी माँ भी भंगी जाति की थीं। अपनी आहत भावना को प्रकट करके लावण्या जी एक आफ़त मोल ले ली। दलित विमर्श के महारथी मसिजीवी ने एक पोस्ट लिखकर उनके आहत होने पर आपत्ति उठायी।

मसिजीवी जी के अनुसार उनकी पूरी पोस्‍ट केवल उस उच्‍चकुलताबोध की ओर संकेत भर करने के लिए ही थी जो हम कथित सवर्णों में त्‍वचा पर हल्‍की सी खरोंच पड़ते ही उभर आता है। इस उच्‍चता बोध की सजा हमें अपमानित करके दी जानी चाहिए या नही ये दलित चिंतन इतिहास की अपनी रेख में तय करेगा/कर रहा है। कुल मिलाकर मैं केवल इसी ओर इंगित कर रहा था कि जिस एक संबोधन से हम झट आहत हो अपनी बाम्‍हनपन या ठकुराई के तमगे दिखाने लगते हैं वह कितनों ही की पीढि़यों का सच रहा है।

मामला बदसूरती की ओर बढ़ता देखकर लावण्या जी ने अपनी पोस्ट ही डिलीट कर दी। गीत संगीत और कविता की शौकीन शान्तिप्रिय लावन्या जी बेचारी लफ़ड़े में क्यों फ़ँसतीं? हम सबने अपनी-अपनी शैली में टिप्पणिया भी की थीं।

इस मसले को बीते काफी दिन हो चले थे लेकिन आभा जी ने अपना घर पर मसिजीवी जी को आड़े हाथों लेते हुए उनके तर्कों का खण्डन करता हुआ आलेख प्रकाशित किया है। अब चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है। लेकिन लावण्या जी को जब अनूप शुक्ल ने यह बताया कि कोई सामग्री डिलीट नहीं हुई है तो वे एक बार फिर से दुखी हो गयी हैं।

मेरा मानना है कि इस सारे मसले से कुछ अच्छी बात ही हुई है। हमारी भाषा में कुछ जातिसूचक शब्द इस प्रकार से घुलमिल गये हैं कि बदले सामाजिक परिवेश में वे कभी कभी संकट पैदा कर देते हैं। यदि हम इस बदली तस्वीर के प्रति जागरुक नहीं रहे तो ऐसे ही करुण दृश्य उपस्थित होते रहेंगे। इस मामले पर मेरा अपना विश्लेषण कुछ यूँ है:

मेरे ख़याल से इस प्रकरण में हमें थोड़े ठण्डे दिमाग से सोचने की जरूरत है। चमार, भंगी इत्यादि होने और कहलाने में बड़ा फर्क है। इन शब्दों के प्रयोग में जो रूढ़ता आ गयी है उसे समझे बगैर हम एक सर्व सम्मत निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाएंगे।

दर असल ‘चमार’ शब्द का प्रयोग अब सिर्फ़ एक जाति के लिए ही नहीं होता बल्कि भाषा में यह एक जीवन शैली का अर्थ भी देता है। सवर्णों के बीच भी किसी के घटिया व्यवहार के लिए ‘चमारपन’ का विशेषण प्रयुक्त होता है। यहाँ चमार का मतलब गन्दा, असभ्य, बदतमीज, दुष्ट, अधम, फूहड़, घिनौना, संस्कारहीन, स्वाभिमानविहीन, निर्लज्ज, और मूर्ख कुछ भी हो सकता है।

कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर भंगी या मेहतर होते थे जिनका पेशा झाड़ू लगाना और सिर पर मैला ढोना होता था। ऐसे लोग गन्दगी के पर्याय होते थे। बड़ा ही तुच्छ समझा जाता था इन्हें। इनसे थोड़ा ऊपर चर्मकारी का पेशा था जो मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालने से लेकर उनका संस्कार करके चमड़े के जूते और दूसरे सामान तैयार करते थे। यही चमार (चर्मकार) कहलाते थे। मोचीगिरी इनका ही पेशा था। इन्हें समाज में जैसा स्थान प्राप्त था, और जैसी छवि थी उसी के अनुरूप इनके जातिसूचक शब्दों से भाषा में मुहावरे और विशेषण बन गये।

आज के आधुनिक समाज में अब जाति आधारित कामों के बँटवारे को समाप्तप्राय किया जा चुका है। अभी उत्तर प्रदेश सरकार ने ग्राम पंचायतों के लिए लाखों सफाई कर्मियों की भर्ती की है जिनमें बेरोजगारी से पीड़ित सभी जातियों के लड़कों ने पैसा खर्च करके स्वेच्छा से स्वच्छकार की नौकरी चुनी है।

सामाजिक दूरियाँ सिमट रही हैं। लेकिन भाषायी रूढ़ियों को इतनी आसानी से नहीं बदला जा सकता। किसी को ‘चमार’ कहना इसीलिए आहत करता है कि उसका आशय आजके समता मूलक समाज में पल रहे एक जाति विशेष के सदस्य से नहीं है बल्कि ऐसे अवगुणों से युक्त होना है जो आज का चमार जाति का व्यक्ति भी धारण करना नहीं चाहेगा। कदाचित्‌ इसी गड़बड़ से बचने के लिए सरकारी विधान में जाति सूचक शब्दों के प्रयोग पर रोक लग चुकी है।

लेकिन सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ लेने के नाम पर अपने को ‘चमार’ कहे जाने का लिखित प्रमाणपत्र मढ़वाकर रखा जाता है। अपने को चमार बताकर पीढ़ी दर पीढ़ी उच्चस्तर की नौकरियाँ बिना पर्याप्त योग्यता के झपट लेने वाले भी समाज में चमार कहे जाने पर लाल-पीला हो जाते हैं।

किसी सवर्ण को जहाँ-तहाँ बेइज्जत करने का कोई मौका नहीं चूकते। अपनी इस कूंठा को खुलेआम व्यक्त करते हैं और दलित उत्पीड़न का झूठा मुकदमा ठोंक देने की धमकी देकर ब्लैक मेल करने पर इस लिए उतारू हो जाते हैं कि उसके बाप-दादों ने इनके बाप-दादों से मैला धुलवाया था।

आज सत्ता और सुविधा पाने के बाद ये जितनी जघन्यता से जातिवाद का डंका पीट रहे हैं उतना शायद इतिहास ने कभी न देखा हो।

तो भाई मसिजीवी जी, इस दोगलेपन का यही कारण है कि `चमार जाति' और `चमार विशेषण' का अन्तर इस शब्द के प्रयोग के समय अक्सर आपस में गड्ड-मड्ड हो जाता है।

लावण्या जी का आहत होना स्वाभाविक है। नीलोफ़र का असभ्य भाषा का प्रयोग निन्दनीय। और आभा जी की कटुक्तियाँ इसी धारणा पर चोट करती हैं।

आधुनिक समाज में सफाई और सैनिटेशन का काम मशीनों और दूसरे उद्योगपतियों ने भी सम्हाल लिए हैं। लेकिन इन विशेषणों से छुटकारा मिलने में अभी वक्त लगेगा। एक सभ्य आदमी को इसके प्रयोग से बचना चाहिए।

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Thursday, March 19, 2009

कैसे-कैसे चाँद मुहम्मद? बताइए ना...!

क्यों गुरू...! टीवी पर कुछ देखा?
हाँ, फ़िजा ने चाँद मोहम्मद की जिन्दगी बदल दी।
बदल क्या दी, बर्बाद कर दी।
लेकिन बर्बाद तो खुद भी हो गयी?
वो तो बर्बाद थी ही। कौन जानता था उसे...?
बड़े शिकार पर हाथ डाला लेकिन धोखा खा गयी।
तो क्या उसे नेता ही मिला था?
चालाक थी जी, तबतक छूने नहीं दिया होगा जबतक शादी न हो जाय।
चन्द्र मोहन तो deputy CM की कुर्सी से गिर पड़ा उस माल के चक्कर में।
बेवकूफ़ लगता है जी।
और क्या?
हाँ यार, लंगोट के ढीले तो और भी हैं राजनीति में... लेकिन मैनेज कर लेते हैं। यही कच्चा निकला।
तुम उस कारसेवक मुख्य मन्त्री की बात कर रहे हो क्या?
अरे नहीं यार, वो कहाँ मैनेज कर पाया। वह भी तो उस पार्षद के चक्कर में अपना कबाड़ा निकलवा चुका...
तो क्या वो पहलवान मास्टर मैनेज कर रहे हैं...?
उसको भी सभी जान गये हैं। इसकी वाली तो दूसरी जोरू बनकर बच्चा भी पैदा कर चुकी है...
गड़बड़ तो भ्रमर सिंह ने शुरू की है...
हाँ, इसे तो सभी पुराने समाजवादी दल्लाल कहने लगे हैं।
इसने जब से पहलवान को मैनेज करना शुरू किया है तबसे धरती पुत्र भी बॉलीवुड की सुन्दरियों में ज्यादा रम गये हैं।
सुना था भ्रमर सिंह किसी पुरानी बेइज्जती का बदला निकाल रहे हैं।
यह सही है, मैने सुना है कि उसके बेटे और भाई ने कमरा बन्द करके इसको जूतों से मारा था।
तभी से इसने कसम खा ली कि इस समाजवादी परिवार को बर्बाद करके दम लूंगा..।
यार, बात सही लगती है। रास्ता तो उसने यही दिखाया है...
तो फिर कांग्रेस ही ठीक बची है... क्यों?
धत्‌! नेहरू को भूल गये क्या? मैडम एड्‌वीना के लिए इन्होंने क्या-क्या नहीं किया।
लेकिन उन्होंने तो माउण्टबेटन से देश की आजादी जल्दी करा लेने में अपनी लंगोटिया दोस्ती का लाभ उठा लिया।
इसका मतलब तो कांग्रेस की नींव में ही आशनाई और प्यार मोहब्बत का खेल है ..
और क्या? गान्धी परिवार में किसी की नॉर्मल शादी हुई क्या?
सबने अपने पार्टनर को दूसरी जाति या पराये पन्थ से उड़ाया..
इन्दिरा जी ने पारसी से, संजय ने पंजाबी से, राजीव गान्धी तो खुद ही ईसाई बन गये। प्रियंका का पति वो बढ़ेरा ...
ये कौन जात का है?
पता नहीं...।
राहुल को तो कोई ढूढे नहीं मिल रही है।
सोच रहा होगा कुछ नया करने को...। किसी दूसरे ग्रह से लाएगा शायद,...
अरे यार नेहरू गजब का स्मार्ट था... लड़कियाँ मरती होंगी उसपर
राहुल पर कोई नहीं मरी?
लेकिन वाजपेयी जी तो गजब कर गये। कोई माई का लाल उंगली नहीं उठा सकता...।
क्या बकते हो...? उन्होंने तो खुद ही कह दिया था कि मैं कुँवारा हूँ लेकिन ब्रह्मचारी नहीं हूँ।
यह तो बड़ी ईमानदारी की बात है भाई।
तो चाँद मुहम्मद ने ही कौन चोरी की है? सबको बताकर तो किया?
लेकिन वह अनाड़ी निकला न।
शादी करने की क्या जरूरत थी। वैसे ही रख लेता...।
हाँ यार, कितने मन्त्री तो रखते हैं।
यू.पी. के एक मन्त्री जी किसी मास्टरनी के पीछे बदनाम होने लगे तो उसे उड़वा ही दिया ...

बात इसके आगे भी बढ़ी होगी लेकिन मेरा स्टेशन आ गया और मैं गाड़ी से उतर गया। मन कर रहा था कि दो-चार स्टेशन आगे तक चला जाऊँ और भारतीय राजनीति के कुछ और चाँद मुहम्मद लोगों के बारे में जान लूँ। पर बेटिकट पकड़े जाने का डर था सो उतर आया हूँ।

अब सोचता हूँ, आपलोगों से कहूँ। अपने-अपने इलाके के चाँद मुहम्मदों के बारे में बताइए। ऊपर चर्चा कर रहे रेलयात्रियों का नाम भी मुझे नहीं मालूम। आपका परिचय जानने में भी मुझे खास रुचि नहीं है। बस ऐसे महारथियों के बारे में खुलकर बताइए जो अपना ‘
लिबिडो’ (libido) सम्हालकर रखने के बजाय अपनी सामाजिक और राजनैतिक छवि भी दाँव पर लगाकर इस लिप्साकुण्ड में कूद गये हैं। नाम लेना जरूरी नहीं है। बस कारनामों का खुलासा करिए। सुप्रीम कोर्ट से डरना तो पड़ेगा भाई।

Sunday, March 15, 2009

खुलकर बोलिए... कुछ भी और सबकुछ।

लजाइए नहीं, आप जो भी हैं हम पूछने नहीं जाएंगे। यहाँ यह कत्तई जरूरी नहीं है। जरूरी है तो सिर्फ़ अपने मन की बात बिना किसी लाग लपेट के कह देने की। हाँ अश्लील बातों को कहकर इस पन्ने को गन्दा और ‘न जाने लायक’ जगह न बनाइए। यहाँ नेता, मन्त्री, वेश्या, चकला, संसद, अमर सिंह, दल्लाल, कल्याण सिंह, ढीली लंगोट, चाँद मोहम्मद, मुल्ला, फ़िजा, इमराना, तालिबान, मुशर्रफ़, पोंगा पण्डित, इमाम, हरामखोरी, सेकुलर, टुटपुँजिए, दिवाकर, निशाचर, गुनाहे-बेलज्जत, मैडम, माइनो, लल्लाजी, राहुल, कुसुम, बहनजी,.... चाहे जो विषय चाहें, उसपर अपने सुविचार, कुविचार, अनाचार, कदाचार प्रकत कर सकते हैं। व्यभिचार से परहेज कर लें तो ठीक रहेगा। तो देर किस बात की। शुरू हो जाइए...।

इस पन्ने पर हिन्दी अंग्रेजी दोनो चलेगा। कोशिश करिए कि हिन्दी देवनागरी में और अंग्रेजी रोमन लिपि में रहे। इधर का माल उधर तो खिंचड़ी हो जाती है।

We live in a civil society. It is supposed that our behavior must be civilized. But the process of civilization makes us dishonest to our natural instinct. We are taught to behave in a certain manner so as not to offend others. So what if we artificially lie to ourselves in order to seem decent?

This so called etiquette and political correctness usurps the spirit of objectivity and distinctness of ideas. Many forums are erected to block the onslaught of the inconvenient reality and protest against the speakers of the truth.

This medium of blogging gives some opportunity to speak your mind without fear and favor. But this can be done only when one has no interest in floating his/her name for popularity, has no image consciousness and a thirst for praise. Let only the ideas float, let only the free articulation be popular, and make only the inadequacies thirsty for fulfillment and solution.

All the visitors are free to ventilate their compressed, suppressed and depressed feelings into this comment box without any hindrance. Only self regulation will suffice to this page.

(Malaya)