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Tuesday, June 9, 2009

लड़कियाँ फिर आगे: नकल यज्ञ फलीभूत हुआ

हाल ही में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा परिषद ने हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट के परीक्षा परिणाम घोषित किए। हर साल की तरह इस साल भी अखबारों ने वही शीर्षक लगाया। लड़कियों ने एक बार फिर बाजी मारी। मैं यह शीर्षक पिछले दो दशक से प्रायः हर साल पढ़ता आ रहा हूँ। इस खबर का आधार यह होता है कि परीक्षा में सम्मिलित होने वाली कुल लड़्कियों में से उत्तीर्ण होने वाली लड़कियों का प्रतिशत लड़कों के उत्तीर्ण प्रतिशत से अधिक होता है। लड़कियों द्वारा बेहतर प्रदर्शन का यह आँकड़ा हमारे ग्रामीण समाज की जिस विडम्बनापूर्ण तस्वीर को उजागर करता है उसकी पड़ताल तब की जा सकती है जब निम्न आँकड़े भी उपलब्ध हों-

 

  1. प्रदेश के चौदह वर्ष से अठारह वर्ष की आयुवर्ग (हाई स्कूल व इण्टर मीडिएट स्तर) के सभी लड़के-लड़कियों का लिंग अनुपात
  2. इसी आयु वर्ग से विद्यालय जाने वाले लड़के व लड़कियों का लिंग अनुपात
  3. बिन्दु-१ व २ के आँकड़ों में अन्तर का प्रतिशत ( शिक्षा के अवसर की सापेक्ष उपलब्धता)
  4. लड़कियों को अपने विद्यालय पर अपने गुरुजनों के सानिध्य में (स्वकेन्द्रीय) परीक्षा देने की सुविधा प्राप्त होने की प्रतिशतता

यदि कोई शोधार्थी इन आँकड़ों को उपलब्ध करा सकें तो ठोस निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। लेकिन अभी तो मैं व्यक्तिगत अनुभव और पर्यवेक्षण के आधार पर ग्रामीण विद्यालयों में लड़कियों की शिक्षा की उपादेयता पर आमजन के दृष्टिकोण को बता सकता हूँ। हाँ, मेरा उद्देश्य कहीं से भी लड़कियों की प्रतिभा को कम बताना नहीं है। न ही मैं सफलता के नये मापदण्ड स्थापित करने वाली लड़कियों का अनादर करना चाहता हूँ। मेरा फोकस केवल ग्रामीण समाज में फैली शिक्षा-निरोधी विषबेल की ओर है।

 

मोटे तौर पर लड़कियों की शिक्षा को गाँवों में उतनी तरजीह नहीं दी जाती जितनी लड़कों की शिक्षा को। लड़कियों के लिए नौकरी का उद्देश्य तो बिरले ही परिवारों में रखा जाता है। जो परिवार लड़कियों को पढ़ाते भी हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि शादी करने में अड़चन न आए। कैरियर का महत्व कम ही होता है। इण्टर पास कराके शादी ढूँढना शुरू कर देते हैं। इसलिए सबकी कोशिश लड़की को बेदाग पास करा लेने की होती है। सबका मुक्त सहयोग मिलता है उन्हें। कई परीक्षा केन्द्र तो लड़कियों को अलग कमरों में बिठाकर विशेष सुविधा देने का इन्तजाम भी करते है। कोई निरीक्षक लड़कियों की चेकिंग नहीं करना चाहता। सभी उसके प्रति उदार दृष्टिकोण रखते हैं।

 

पास हो जाएगी तो शादी करके घर बसा लेगी और क्या? लड़कों से नौकरी तो छीन नहीं लेगी।

 

साल भर घर में झाड़ू-पोंछा, चौका-बरतन और रसोई सम्हालने वाली लड़कियाँ और बहुएं भी इण्टर पास करने के लिए परीक्षाकेन्द्रों पर पहुँची मिल जाएंगी। बहुएं इसलिए कि अब हाई-स्कूल/इण्टर की मेरिट पर भी गाँव में शिक्षामित्र और आँगन वाणी कार्यकर्त्री की नौकरी मिलने लगी है।

 

पहले तो केवल सॉल्वर रखे जाते थे, अब कुछ केन्द्र राइटर की व्यवस्था भी करते हैं। मुलायम सिंह यादव की कन्या विद्या धन योजना ने तो इस दिशा में कमाल ही कर दिया। इस योजना में इंटर पास होते ही २०००० रुपए का चेक सुनिश्चित था। केवल गरीबी का सर्टिफिकेट लगाना होता था जो इस भ्रष्ट समाज में काफी सुलभ हो गया है।

 

इण्टर की परीक्षा पास करने के बाद यदि तत्काल शादी का जुगाड़ नहीं फिट बैठा तो आगे भी नाम लिखाकर प्राइवेट पढ़ाई करानी पड़ती है ताकि लड़के वालों को बताया जा सके कि लड़की बी.ए./एम.ए. में पढ़ रही है। शादी तय हो जाने के बाद यह लड़के के ऊपर निर्भर है कि वह आगे क्या कराएगा। ऐसी हालत में लड़कियों की शिक्षा का उद्देश्य कैरियर बनाने और काबिलियत बढ़ाने के बजाय सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य बहू बनने का हो जाता है। इस उद्देश्य के मद्देनजर निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की लड़कियाँ शिक्षा के नाम पर केवल प्रमाणपत्र इकठ्ठा करके रह जाती हैं, जिसमें पूरा समाज ही सहयोग करने को आतुर रहता है।

 

इस वर्ष की परीक्षाओं में शिक्षा विभाग के अधिकारियों से लेकर अभिभावकों और छात्रों ने नकल के धन्धे का भरपुर लुत्फ़ उठाया। परीक्षा केन्द्र नीलाम हुए। प्रदेश के शिक्षा मन्त्री को खुलेआम स्वीकार करना पड़ा कि नकल हुई है। इसमें रोचक बात यह है कि प्रदेश के शिक्षाधिकारियों की बैठक में उन्होंने सबको फटकार लगाते हुए कहा कि नकल कराने वाले विद्यालयों को चिह्नित करके उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाएगी। यानि जहाँ का परीक्षा परिणाम अपेक्षा से अधिक अच्छा रहा है उनको नकलची मानकर दण्डित किया जाएगा।

 

मन्त्री जी ने उसी बैठक में राजकीय विद्यालयों के खराब प्रदर्शन को आड़े हाथों लेते हुए सम्बन्धित शिक्षकों के विरुद्ध कार्यवाही की चेतावनी भी दे डाली। वे बेचारे सोच रहे हैं कि उन्हें भी शायद नकल यज्ञ में कुछ आहुति देनी चाहिए थी।

[मलय]

Saturday, May 16, 2009

भारत में काफ़्काइयत बदस्तूर जारी रहेगी: फ़्रांस्वाँ गातिए ध्यान दें !

चेक उपन्यास्कार फ़्रैन्ज़ काफ़्का (Franz kafka, 1852-1931) ने अपने उपन्यासों The Trial ,The Castle, व The Metamorphosis में एक ऐसे विवेक भ्रष्ट समाज की रचना की है जहाँ सब कुछ नित्तांत बेतुका, अतार्किक, हास्यास्पद, खतरनाक और घोर अंधेरगर्दी के घटाटोप से अच्छादित दिखाई देता है। उनके उपन्यासों से जिस प्रकार के बेढंगे समाज का चित्र उभरता है, वह इतना बदनाम हुआ है कि व्यावहारिक दुनिया मे जहां ऐसे समाज दॄष्टिगोचर होते हैं उन्हें काफ्काई समाज [Kafkaesque/Kafkaian] की संज्ञा दे दी जाती है। ऐसी प्रतिगामी प्रवृत्तियों को काफ़्काइयत कहा जा सकता है।

 

फ़्रांस्वाँ गातिए (Francois Gautier) लम्बे समय से भारत में रहते हुए अनेक यूरोपीय पत्र-पत्रिकाओं के लिए काम किया है। दक्षिण एशियाई समाज और राजनीति के फ्रांसीसी विशेषज्ञ व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्टित पत्रकार फ़्रांस्वा गातिए ने अपने एक लेख मे यहां के वर्तमान राजनैतिक परिदॄश्य में काफ़्काई समाज की झलक देखते हुए लिखा है कि यहाँ की राजनीति में कई बाते इतनी बेतुकी हैं और ऐसे नाजायज निष्ठुर, उत्तेजनापूर्ण और अतार्किक स्तर को छूने लगी हैं कि दिमाग परेशान हो उठता है। फिर भी न तो यहाँ के राजनेता और न ही यहाँ का प्रेस इसमें कुछ गलत देख पाता है। कुछ उदाहरण देखिए:-

 

(१.)भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता वरुण गान्धी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत लगभग तीन सप्ताह जेल में सिर्फ़ इसलिए बिताना पड़ा क्योंकि उन्होंने कुछ ऐसा कह दिया था जो दोषपूर्ण था। जबकी बहुत से मुल्ला अपने जुम्मा की तक़रीर में आग और जहर उगलते रहते हैं, किन्तु कोई गिरफ़्तार नही किया जाता क्योंकि इससे तुरन्त दंगे भड़कने का अंदेशा होता है।

 

(२.)साध्वी प्रज्ञा नामक एक हिन्दू सन्यासी महीनों से जेल में यातना भुगत रही है जब कि अभी तक मालेगाँव धमाकों में उसकी संलिप्तता का एक भी विश्वसनीय सबूत जुटाया नहीं जा सका है। हाल ही मे उसके उपर मुम्बई जेल के भीतर एक मुसलमान कैदी ने हमला कर दिया जिसमे उनके मुँह, नाक और गले पर चोटे आयीं।

 

वहीं एक मुसलमान नेता अब्दुल नासिर मदनी है जो १९९८ के कोयम्बटूर दंगों के आरोपी थे। इसमें ६० निर्दोष लोगों की जान गई थी। न्याय प्रक्रिया की ढिलाई के चलते वे बरी हो गये और आजकल केरल में सी.पी.आई.(एम.) के साथ उनकी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी चुनाव प्रचार कर रही है- है न यह काफ़्काइयत?

 

(३.) उड़ीसा के कंधमाल से भाजपा प्रत्याशी अशोक साहू को पुलिस ने इसलिए गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने चर्च के उपर भोले-भाले आदिवासियों को जबरन ईसाई बनाने के लिए विदेशी धन के प्रयोग का आरोप लगाया था। जबकि यह सभी जानते है कि यह आरोप पूरी तरह पुष्ट तथ्यों पर आधारित होने के कारण सिद्ध हो चुका है।

 

वहीं दूसरी ओर आतंकी अजमल क़साब, जो मुम्बई में हत्या के अभियान पर निकला था, आजकल सरकारी खर्चे पर शाही जिन्दगी जी रहा है। उसके विरुद्ध तैयार आरोप पत्र के ११००० पन्नों को उर्दू में अनूदित किया जा रहा है क्योंकि इन सज्जन ने ऐसी इच्छा व्यक्त की है। यह काफ़्काइयत है कि नहीं?

 

(४.) भारत के राष्ट्रपति चुनाव के परिणाम घोषित हो जाने से पहले अफ़जल गुरू को फाँसी पर लटकाने की अनुमति नही दे सकतीं। वही आतंकी सरगना जो १३ दिसम्बर २००१ को संसद पर हमले के मामले में दोषी ठहराया जा चुका है। फाँसी इसलिए टाली जा रही है क्योंकि इससे मुस्लिम वोट छिटक जाने का डर है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस यह कहते नही थकती कि भारत के मुसलमान राष्ट्रभक्त है। लेकिन एक सिद्ध राष्ट्रद्रोही मुस्लमान को फाँसी देने पर सामान्य मुसलमानों का वोट खो देने का डर क्यों सताता है? आप फैसला कीजिए कि यह काफ़्काइयत है कि नही?

 

(५.) तमिल चीतों ने एक मूर्खतापूर्ण सोच के आधार पर राजीव गान्धी को अत्यन्त क्रूरता पूर्वक सिर्फ इसलिए उनके चीथड़े उड़ा दिये थे कि उनके दुबारा प्रधानमंत्री बन जाने का अंदेशा था। गान्धी परिवार के साथ-साथ यह देश के लिए भी एक त्रासदी थी। लेकिन आज, तमिलनाडु के वोटरों को रिझाने के लिए उन्हीं की विधवा सोनिया गान्धी ने श्रीलंका की सरकार के पास अपना विशेष दूत इस उद्देश्य से भेंजा ताकि वहाँ युद्धविराम लागू करने का दबाव बना सके; जबकि बीस साल से चल रहे खूनी संघर्ष के बाद वहाँ की सरकार अब खँखार तमिल चीतो का सफाया करने के द्वार पर खड़ी है। क्या यह बात कहीं से भी समझ में आने वाली है? क्या यह काफ़्काइयत नही है?

 

(६.) भारत में सबकी बराबरी और जाति से उपर उठने की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं। सम्विधान में इसकी स्पष्ट घोषणा है। लेकिन १९४७ से अबतक देश के राजनेताओं ने, खासकर कांग्रेस और बाद में इससे निकाले गये वी.पी.सिंह, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव आदि ने देश को जाति और धर्म के आधार पर बाँटने का निराशाजनक कृत्य ही किया है। लेकिन अब मायावती ने उन सबको पीछे छोड़ दिया है उन्होंने प्रधानमंत्री बनने की अपने ख्वाहिश को पूरा करने के लिए १६ अन्य जातियों को भी अनुसूचित जाति मे शामिल करने का वादा कर दिया है। क्या वोट पाने के लिए इससे भी बड़ा क़ाफ़्काई तरीका आप सोच सकते है?

 

(७.) भारत मे चुनाव अभियान पर किसी को २५ लाख से अधिक खर्च करने की इज़ाजत नही है। लेकिन सबको यह पता है कि सांसद बनने के लिए दसियों करोड़ खर्च करने पड़ते है। आपको चुनावी अभियान को शानदार बनाने के लिए सैकड़ों कारों के काफिलों का प्रदर्शन करना है, निजी हवाई-जहाज और हेलीकाप्टर भाड़े पर लेना है, मुफ्त की साड़ियां-धोतियाँ, टेलीविजन और यहाँ तक की नगदी भी, और बहुत कुछ बाँटना है। आखिर इस सब के लिए यह कालाधन कहाँ से आता है? भ्रष्ट व्यापारियों से, माफिया से, दलाली से, और क्या? क्या इससे भी अधिक काफ़्काइयत की कल्पना की जा सकती है?

 

कुल मिलाकर भारत में लोकतंत्र पूरी तरह काफ़्काइयत का नमूना बनकर रह गया है क्योंकि यह इतना बिगड़ चुका है और गलत हाथों में अपहृत हो चुका है कि अब इसे पूरी तरह एब्सर्ड ही कहा जा सकता है।

 

इस बात में सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि भारतीय प्रेस और मीडिया भी अपनी भूमिका नहीं निभा रहा है। क्योंकि मुख्यधारा के किसी भी अखबार या न्यूज चैनल ने आपत्ती नहीं उठायी जब वरुण गान्धी जेल में थे या जब मदनी सजा से छूट गये थे। और एक पार्टी में पूरा सहयोग और सम्मान पाते रहे।

 

वस्तुतः मुख्य समस्या यह है कि भारत लम्बे समय तक विदेशियों का गुलाम रहा है। वहीं चीन में ऐसा नहीं है। वहाँ के लोग अपनी संस्कृति के प्रति गौरव का भाव रखते हैं तथा घोर राष्ट्रवादी हैं। इसके उलट भारतीय मानस में यहाँ की गुलामी के इतिहास ने क हीनता ग्रन्थि का निर्माण किया है। यहाँ के कथित बुद्धिजीवी अपनी ही हर बात विश्वसनीय मानने से पहले पश्व्चिमी स्वीकृति और समर्थन के लिए उधर का मुँह ताकते हैं। भारत में पाश्चात्य शैली का लोकतन्त्र अपनाने (नकल करने ) का ऐसा विचित्र व्यामोह है कि उन्हें इसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढालने की सुध ही नहीं रहती।

 

यहाँ का शासन तंत्र और समाज इतना दूषित हो चुका है कि अब बीमार हिस्से को एक बड़े ऑपरेशन द्वारा काट फेंकने का रास्ता बचा है। अब बड़े स्तर पर साफ-सफाई किया जाना अपरिहार्य हो गया है।

 

नोट: फ़्रांस्वाँ गातिए का यह लेख कुछ सप्ताह पहले आया था। आज इसे यहाँ प्रस्तुत करते समय नयी लोकसभा का स्वरूप सामने आ चुका है। जनता ने एक बार फिर उसी सरकार को चुना है जो पिछले पाँच साल तक इस काफ़्काइयत की पोषक रही थी। इस परिणाम ने बता दिया कि भारत के वोटर इस अन्धेरगर्दी में बने रहने को ही पसन्द करते हैं। शायद उनका मानना है कि इससे बेहतर विकल्प देश में मौजूद ही नहीं है।

फ़्राँन्ज़ काफ़्का अमर रहें!!!

मलय त्रिदेव

Tuesday, April 21, 2009

लंबे जूते में चौड़े पाँव... हिन्दी भारत में राजकिशोर जी का लेख

[राजकिशोर एक अनुभवी और कलम के धनी पत्रकार व साहित्यकार हैं। समाजवादी आन्दोलन उनके मन को हमेशा मथता रहा है। धरतीपुत्र माननीय मुलायम जी का लोहियावादी चेहरा अमर सिंह की कुत्सित राजनीति के रंग में इतना सराबोर हो गया है कि पहचानना मुश्किल है। वे अब फिल्मी तारिकाओं के चकमक सानिध्य में ही डूबे हुए हैं। राजकिशोर  मुलायम की इस पतन-यात्रा पर प्रकाश डाल रहे हैं हिन्दी-भारत ब्लॉग पर।]


माना जाता है कि जो एक बार कम्युनिस्ट हो गया, वह जीवन भर के लिए कम्युनिस्ट हो गया। भारत के समाजवादियों के बारे में भी यह सच है। फर्क यह है कि कम्युनिस्ट चरित्र में धारावाहिकता होती है। वह उलटा-पुलटा बोलता भी है, तो अकेले नहीं -- अपनी पूरी बिरादरी के साथ। समाजवादी में यह गुण महीं पाया जाता। वह अनमे मूल विचारों का दमन करना जानता है। यही कारण है कि एक जमाने में राममनोहर लोहिया के अनुयायी इस समय अनेक दलों में पाए जाते हैं और कहीं भी कसमसाते दिखाई नहीं देते। मुलायम सिंह यादव ने दल तो नहीं बदला, वे अपने को ही बदलते रहे। इसीलिए कई प्रसंगों में वे उससे ज्यादा हँसी के पात्र नजर आते हैं जितने वे वास्तव में हैं।


सार्वजनिक जीवन में अग्रेजी के प्रयोग पर पाबंदी के पक्ष में मुलायम सिंह का चुनाव घोषणा पत्र एक ऐसा दस्तावेज है जो अपने आपमें तो सही है, पर उस पर धूल की इतनी परतें चढ़ चुकी हैं कि उसकी मूल भावना कहीं दिखाई नहीं देती। मुलायम सिंह जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनकी राजनीतिक चेतना आज की तुलना में कम प्रदूषित यानी बेहतर थी। तब उन्होंने अंग्रेजी के इस्तेमाल के प्रति अपना जो लोहियाई अनुराग दिखाया था, वह उनके तब के निकटवर्ती समाजवादी अतीत की प्रतिध्वनि और कुछ हद तक सुहावनी थी। कम से कम हम जैसे लोगों के लिए, जिनकी आंख लोहिया साहित्य पढ़ कर और लोहिया के भाषण सुन कर खुली थी।

 
उन दिनों मुलायम सिंह हिन्दी तथा अन्य लोक भाषाओं के प्रयोग पर जोर दे रहे थे। वे चाहते थे कि केंद्र उत्तर प्रदेश सरकार से हिन्दी में पत्र व्यवहार करे। उन्होंने अपनी यह इच्छा भी जताई थी कि गैर-हिन्दी भाषी राज्यों से उनकी सरकार उनकी भाषा में ही पत्र व्यवहार करेगी। यह एक क्रांतिकारी प्रस्ताव था। लोहिया का मानना था कि भारत में सत्ता हासिल करने के लिए इन तीनों में किन्हीं दो घटकों का योग आवश्यक है -- जाति, संपत्ति और अंग्रेजी। मुलायम सिंह ने जाति पर हमला किया। पर संपत्ति पर हमला करने में उनकी थोड़ी भी दिलचस्पी नहीं थी। आज मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के अमीरतम नेताओं में हैं, जबकि लोहिया की मृत्यु के समय उनके पास कुछ हजार रुपए भी नहीं थे। मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अपने दिवंगत राजनीतिक गुरु की स्मृति में अंग्रेजी पर धावा बोलने की कोशिश जरूर की, पर इस विस्फोट से जो बवाल पैदा हुआ, उससे वे खुद दहल गए और उन्होंने अपने इस प्रयोग को आगे बढ़ाने से हाथ खींच लिया। पर दूसरी आदतों की तरह समाजवादी आदतें भी जल्दी नहीं मरतीं। वर्तमान लोक सभा चुनाव के कोलाहल में अंग्रेजी विरोध का उनका भूत फिर जाग उठा है और देश के सारे बुद्धिजीवी उन पर हो-हो कर हँस रहे हैं।


इन बुद्धिजीवियों की संकीर्णता पर अफसोस होता है। ये बौद्धिक नहीं, बुद्धिकर्मी हैं। अगर इन्हें देश और समाज की सच्ची चिंता होती, तब भी ये मुलायम सिंह के अंग्रेजी विरोध पर हँसते। पर उस हँसी की अंतर्वस्तु कुछ और होती। तब वे कहते कि अंग्रेजी हटाने की बात तो सही है, क्योंकि अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रख कर और उस वर्चस्व को बढ़ाते हुए भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता। देश के हर आदमी को अंग्रेजी में सिद्ध बनाने की कोशिश न केवल कभी सफल नहीं हो सकती, बल्कि ऐसी कोशिश देश के लिए अहितकर भी है। दुनिया भर में किसी भी देश ने पराई भाषा में विकास नहीं किया है। सच्चा विकास तो अपनी भाषा में ही होता है। इसके बाद वे बौद्धिक लोग मुलायम सिंह से पूछते कि सर, अन्य सभी नीतियों को यथावत रख कर आप अंग्रेजी के बहिष्कार के प्रयत्न में कैसे सफल हो सकते हैं? अंग्रेजी की विदाई तो समाजवाद की ओर कदम बढ़ाते हुए समाज में ही सकती है, पूंजीवादी व्यवस्था तो पूर्व-उपनिवेशों में उसी भाषा को आगे बढ़ाएगी जिस भाषा की गुलामी उन पर थोपी गई थी। भारत पर अगर जर्मन आधिपत्य होता, तो आज हमारा भद्रलोक अंग्रेजी नहीं, जर्मन बोलता होता। इसलिए भारत के सार्वजनिक जीवन, शिक्षा और संस्कृति में अंग्रेजी का बढ़ता हुआ उपयोग पूर्व गुलामी का ही नया संस्करण है। हर गुलामी विषमता से पैदा होती है और फिर बदले में विषमता को दृढ़ करती है। इसलिए अन्य विषमताओं को स्वीकार करते हुए सिर्फ एक विषमता से लोहा ले पाना असंभव है। मुलायम सिंह यही करते हुए दिखाई पड़ रहे हैं, सो अंग्रेजी विरोध का उनका यह अभियान कभी सफल नहीं हो सकता।


असल में, मुलायम सिंह ने जब समाजवाद की दीक्षा ली थी, तब से आज के बीच दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है। जूता लंबा होता गया है और मुलायम सिंह का पैर चौड़ा होता गया है। पहले उनके दोस्त और साथी साधारण लोग हुआ करते थे। आज वे अमर सिंह जैसी विभूतियों से घिरे हुए हैं। इसलिए तर्क की माँग तो यही है कि उन्हें अपनी फाइव स्टार चौकड़ी के राजनीतिक और समाजिक चरित्र के अनुसार ही बोलना चाहिए। छद्म ही करना हो, तो आडवाणी और राहुल की तरह करना चाहिए। तभी उनकी आवाज में प्रामाणिकता आएगी। तमाम तरह के पाखंडों के बीच अगर वे एक सच का उच्चारण करेंगे, तो मुसीबत में फँस जाएँगे। लंबे जूते में चौड़ा पैर नहीं समा सकता।

 
यह देख कर बहुत तकलीफ होती है कि भारत में भाषा का सवाल इस कदर उलझ और बिगड़ चुका है कि निकट भविष्य में उसका कोई संतोषजनक समाधान नहीं दिखाई देता। राष्ट्रभाषा की तो अब कोई जिक्र ही नहीं करता। यहां तक कि वे भी नहीं, जो अपने को राष्ट्रवाद का कट्टर प्रहरी बताते हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि राष्ट्रभाषा का सवाल जो उठाएगा, उसे पागल करार दिया जाएगा, जबकि असली पागल वे हैं जो भारत को एक राष्ट्र के रूप में तो देखते हैं, पर उसकी कोई कॉमन भाषा हो, ताकि भारत के एक कोने की जनता दूसरे कोने की जनता से संवाद कर सके, इसका विरोध करते हैं। एक जमाने में सोचा जाता था कि अंतत: हिन्दी का विकास संपर्क भाषा के रूप में होगा। हिन्दी अभी भी गरीब और निम्न मध्य वर्ग के लोगों की संपर्क भाषा है। पर देश का शिष्ट वर्ग, जो असल में विशिष्ट वर्ग है, बड़ी तेजी से अंग्रेजी को अपना रहा है। देश रिक्शे की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है, पर इस विशिष्ट वर्ग के सदस्य मोटरगाड़ी की रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं। आज कोई भी अच्छी नौकरी पाने के लिए अंग्रेजी की जानकारी अनिवार्य है। हालत ऐसी हो चुकी है कि आप अंग्रेजी नहीं जानते, तो आपको पहली नजर में मूर्ख या अविकसित मान लिया जाएगा।

भारतीय समाज का निर्णायक वर्ग अंग्रेजी को अपना दिलो-दिमाग दे चुका है। ऐसे माहौल में मुलायम सिंह अगर अंग्रेजी के विरोध में अपनी जबान फड़फड़ाते हैं, तो सभी वर्चस्वशाली लोग उन्हें जनता का दुश्मन करार देंगे। यही हो भी रहा है। यह इस बात का एक मजबूत उदाहरण है कि पॉप गाते-गाते अगर आप अचानक बिरहा की धुन छेड़ दें, तो क्या होगा।

- राजकिशोर

Monday, March 23, 2009

कस्बा पर मायावती की आरती में आप भी शामिल हो लें।

कस्बा पर रवीश कुमार जी ने मायावती के सम्बन्ध में एक पोस्ट लिखी है। ये वही स्टार पत्रकार हैं जो आजकल एन.डी.टी.वी. इण्डिया के प्राइम टाइम के मजे हुए एंकर हैं। किसी जनमत सर्वेक्षण का विश्लेषण करते हुए इन्होंने लिखा है;
....आज हिंदुस्तान में एक सर्वे आया है। कुल ६२२ लोगों में से ७४ फीसदी लोगों को मायावती का पीएम बनना पसंद नहीं हैं। इतनी ही फीसदी लोगों को लगता है कि भारत की विदेशों में छवि ख़राब हो जाएगी। अब इनकी सोच राजनीतिक कारणों से होती तो समझ में आती कि हम पहले से ही किसी पार्टी को पसंद करते हैं तो मायावती के लिए जगह नहीं हैं। मगर इनकी सोच की बुनियाद में एक डर है।


उत्तरप्रदेश की पूरी अस्सी सीटें ही मायावती जीत जाएं तो पीएम बनने से कौन रोक लेगा। यह एक ख्याली बात ज़रूर है मगर इसलिए कह रहा हूं कि इतने बड़े प्रदेश में साफ बहुमत के साथ सरकार चलाने वाली महिला को लेकर अब भी डर है। चार बार मुख्यमंत्री बनना किसी को पसंद नहीं आ रहा। लोग भूल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में मायावती ने खंडित राजनीति को खत्म कर दिया है। अब वहां एक पार्टी की सरकार है। बीजेपी, कांग्रेस अपना वजूद बचाते हुए मुलायम और अजित के सहारे मायावती से लड़ रहे हैं। पहले मायावती सबसे लड़ती थीं और अब सब मायावती से लड़ रहे हैं। यह एक बदलाव मायावती ने अकेले दम पर किया है।....

यूपी में मायावती के अस्सी फीसदी विधायक दूसरी जाति से हैं। यानी हर जाति के लोग जो अपर कास्ट कहलाना पसंद करते हैं, मायावती के आदेशों को सर आंखों पर रखते हैं और दौड़े चले आते हैं। एक यह क्रांतिकारी बदलाव है। एक महिला, एक दलित के साथ काम करने के लिए होड़ मची है।


रवीश जी की कलम से ऐसा सतही विश्लेषण अपेक्षित नहीं था। दुखद है यह।

सच यह है कि मायावती की योग्यता भारतीय लोकतंत्र की चुनावी पद्धति और भारतीय समाज की जातीयता आधारित सोच का सटीक इश्तेमाल कर लेने भर की है।

हमारे चुनाव बहुमत के सबसे सरल किन्तु आभासी रूप पर आधारित हैं जहाँ बहुमत कुल मतों के सापेक्ष नहीं देखा जाता बल्कि अन्य उम्मीदवारों के सापेक्ष देखा जाता है। कुल १०० मतदाताओं में से १० का वोट पाने वाला भी बहुमत से जीता हुआ माना जाता है। कारण यह कि शेष ९० में से ५०-६० तो वोट डालते ही नहीं और बाकी ३०-४० वोट अन्य उम्मीदवार थोड़ा थोड़ा बाँट लेते हैं। एक सफल उम्मीदवार वही है जो इन दस-बीस वोटों का जुगाड़ पक्का कर ले।

मायावती जी ने पहले कांशीराम जी की छत्रछाया में दलित जाति को अपना बनाया। तरीका आसान था। दलित वर्ग में जागरूकता नहीं बल्कि शेष तीन वर्गों के विरुद्ध आक्रोश भरकर। उस समय का नारा तिलक, तराजू, और तलवार; इनको मारो जूते चार याद है न...!

जब दलित समुदाय इनकी जेब में चला गया तब सवर्णों के दूसरे विरोधी मुलायम जी के जेब में बन्द ‘पिछड़े’ समुदाय के साथ गठबन्धन का दौर चला लेकिन वहाँ ‘सहयोग’ पर ‘प्रतिद्वन्द्विता’ हावी हो गयी।

केवल दलित वोट से जिताऊ बहुमत नहीं मिल पाता इसलिए उन्होंने अपनी दलित भावना को थोड़ा चौड़ा किया और बहुजन से सर्वजन की ओर कूँच किया है। कलेजे पर पत्थर रखकर उनको फुसलाने चल पड़ीं जो सबसे बड़े विरोधी हुआ करते थे। ब्राह्मण समुदाय भाजपा और कांग्रेस के लिजलिजे, नपुंसक और भ्रष्ट नेताओं से कुपित होकर, तथा ठाकुर बिरादरी की मुलायम-अमर की अति भ्रष्ट, उद्दण्ड और सिद्धान्तहीन (और बाद में अधोगामी) जोड़ी के साथ पींगे बढ़ाने को देखते हुए मजबूरी में इस माया के साथ जा लगा। यह हमारे समाज की संरचना, लोगों की स्मरणलोप की प्रवृत्ति और घटिया मानसिकता ही ऐसी है कि मायावती की नीति सफल हो रही है।

लेकिन इसका अर्थ यदि रवीश जी यह लगाते हैं कि समाज का ७६ प्रतिशत वर्ग उन्हें नापसन्द करने के कारण ‘मूर्ख’ है तो शायद वे आज आइने के सामने बैठे हुए हैं। सच्चाई यह है कि मायावती की राजनीति में उन सभी बुराइयों ने आसमान छुआ है जो कांग्रेसी या भाजपाई सरकारों में छिपछिपाकर की जाती थीं। जिनके प्रति एक संकोच और सामाजिक अस्वीकृति का डर हुआ करता था। सपाइयों ने इन्हें संस्थागत बना दिया था।

अपराधी तत्वों का प्रयोग, जातिवादी भावनाओं का प्रसार, चुनावी समीकरण में उम्मीदवार की व्यक्तिगत योग्यता के बजाय उसके धनबल और पशुबल को अधिक महत्व, सत्ता में आने पर सरकारी तंत्र को काली कमाई करने की मशीन बनाना, सरकारी पदों पर योग्यता के बजाय जातीय, धार्मिक, क्षेत्रीय और थैली भेंट करने की क्षमता के आधार पर तैनाती, संवैधानिक पदों पर अयोग्य, नपुंसक, स्वामीभक्त, निर्लज्ज और भ्रष्ट व्यक्तियों को बिठाकर उनसे अपने स्वार्थ की सिद्धि कराने का काम इस सरकार ने जिस पैमाने पर किया है वह मुलायम जी के बनाये रिकार्ड को काफी पीछे छोड़ चुका है।

इसलिए यदि रवीश जी मुग्ध होकर माया मेमसाहब की यह विरुदावली गा रहे हैं और ७६% लोगों को मूर्ख कह कर जुगुप्सा फैला रहे हैं तो यह संकेत देता है कि तथाकथित चौथा स्तम्भ अब दीमकों का शिकार हो गया है। समाज के तथाकथित प्रहरी अब नेताओं का दिया माल उड़ाकर फाइव स्टार शैली का जीवन जीने के लिए अपनी आत्मा को कोठे पर सजा चुके हैं